मुनिश्री क्षमासागर की कविताओं को बिना पढ़े सोचा जा सकता है कि ये दिगम्बर,
वीतराग मुनि की संदेशबहुल नीति-कथाएँ होंगी, जिनमें सांसारिक जीवन की
आसक्तियों/विकृतियों को रेखांकित किया गया होगा, पर ऐसा कतई नहीं है।
इनमें वे अपनी आकांक्षाओं और सपनों के शेष से साक्षात्कार की मुद्रा में
उपस्थित हैं। ये ऐसे संवेदनशील कवि की भाषिक संरचनाएँ हैं, जो अनुभव संपन्न
और विचारप्रवण तो है ही और वह निर्लिप्त भावुकतावश अपने विचारोद्वेलन की
अनुगूँज यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ, कहीं भी और किसी भी बहाने सुन सकता है।
इसलिए इन कविताओं में चिड़िया, नदी, समुद्र, सूरज, वृक्ष बार-बार आते हैं,
जिनसे बतियाते हुए कवि अपने मन को खोलता और कभी उनके मुख से बोलता मिलता
है। ये कविताएँ सरल हैं, पर सरलता गहरी है। ये कविताएँ सहज हैं, पर सहजता
निर्मम है। ये परोक्ष में संदेश भी कह जाती हैं, पर अपमान नहीं करतीं।
इनमें कवि की सूक्ष्म अंतर्दृष्टि समकालीन जीवन-स्थितियों से निराक्रोश
मुठभेड़ करती है।
— डॉ. सरोज कुमार, इंदौर
01
मुक्ति
जो ज्योति-सा
मेरे हृदय में
रोशनी भरता रहा
वह देवता।
जो साँस बन
इस देह में
आता रहा
वह देवता।
जिसका मिलन
इस आत्मा में
विराग का
कोई अनोखा गीत
बनकर, गूँजता
प्रतिक्षण रहा
वह देवता।
मैं बँधा जिससे
मुझे जो मुक्ति का
सन्देश नव
देता रहा
वह देवता।
जो समय की
तूलिका से
मेरे समय पर
निज समय
लिखता रहा
वह देवता।
जो मूर्ति में
कोई रूप धरता
पर अरूपी ही रहा
वह देवता।
जो दूर रहकर भी
सदा से
साथ मेरे है
यही अहसास
देता रहा
वह देवता।
मैं जागता हूँ
या नहीं
यह देखने
द्वार पर मेरे
दस्तक सदा
देता रहा
वह देवता।
जो गति
मेरी नियति था
ठीक मुझ-सा ही
मुझे करता रहा,
वह देवता।
02
निःशेष
मुझे
कहना है अभी
वह शब्द
जिसे कहकर
निःशब्द हो जाऊँ
मुझे
देना है अभी
वह सब
जिसे देकर
निःशेष हो जाऊँ
मुझे
रहना है अभी
इस तरह
कि मैं रहूँ
लेकिन
‘मैं’ रह न जाऊँ।
03
नियम बने रहते हैं
नियम सब
बने हैं
इसलिए कि
हम बने रह सकें।
होता यह है
कि हम टूटते जाते हैं
और नियम बने रहते हैं।
टूटे हुए नियम
जोड़ना आसान है
पर टूटी हुई जिंदगी
जोड़ने में
जिन्दगियाँ गुजर जाती हैं।
04
स्वीकारोक्ति
हम
सबकी सब बातें
चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं।
लोग कहते हैं
कि सब स्वीकार करते जाना
कमजोरी है।
सो हम इस बात को भी
स्वीकार कर लेते हैं।
क्या करें
हम कमजोर हैं
हमसे व्यर्थ
लड़ा नहीं जाता।
05
गन्तव्य
यात्रा पर निकला हूँ,
लोग बार-बार
पूछते हैं, कितना चलोगे?
कहाँ तक जाना है?
मैं मुस्कुराकर
आगे बढ़ जाता हूँ,
किससे कहूँ
कि कहीं तो नहीं जाना,
मुझे इस बार
अपने तक आना है।
06
पहला कदम
सारे द्वार
खोलकर
बाहर निकल
आया हूँ,
यह
मेरे भीतर
प्रवेश का
पहला कदम है।
07
अकिंचन
देने के लिए
मेरे पास
क्या है?
सिवाय इस अहसास के
कि कोई
खाली हाथ
लौट न जाए।
08
साधना
अभी मुझे और धीमे
कदम रखना है,
अभी तो
चलने की
आवाज़ आती है।
09
भाई तुम महान हो
मैंने आकाश से कहा -
तुम बहुत ऊँचे हो
आकाश ने
मुस्कराकर कहा -
तुम मुझसे भी
ज़्यादा ऊँचे हो
मैंने सागर से कहा -
तुम खूब गहरे हो
सागर ने
लहराकर कहा -
तुम मुझसे भी
अधिक गहरे हो
मैंने सूरज से कहा -
सूरज दादा!
तुम बहुत तेजस्वी हो
सूरज ने हँसकर कहा -
तुम मुझसे भी
कई गुने तेजस्वी हो
मैंने आदमी से कहा -
भाई तुम महान हो
आदमी झट से बोला -
तुम ठीक कहते हो।
10
मैं तुम्हारा हूँ
मुझे उन अर्थों में
अपना मत मानना
जिन अर्थों में लोग
किसी को अपना कह देते हैं।
मैं तुम्हारा हूँ
उस तरह
जिस तरह, कोई
अपना होता है।
मैं तुम्हारा हूँ
उस तरह
जिस तरह, कोई
सबका होता है।
मैं तुम्हारा हूँ
उस तरह
जिस तरह, कोई
परमात्मा का होता है।
11
कहनी - अनकहनी
कुछ कहने से पहले
हम कितना सोचते हैं
कि इस बार
सब कह देंगे
पर कहने के बाद
मालूम पड़ता है
कि कहा कम
और अनकहा
ज़्यादा रह गया है।
असल में, भावों के
प्रवाह में शब्दों का सेतु
या तो बन ही नहीं पाता
या टूट जाता है।
12
सहयात्राएँ
चलते-चलते
देखता हूँ,
अनायास ही
कोई न कोई
साथ हो जाता है।
कुछ दूर
वह साथ चलता है
फिर या तो
ठहर जाता है
या रास्ता ही बदल लेता है।
मैं यह सोचकर
आगे बढ़ जाता हूँ,
कि साथ चलने का सुख
इतना ही होता है।
13
भगवान
भगवान
कितना बड़ा है
मैंने
एक बच्चे से पूछा
उसने दोनों हाथ फैलाये
और जैसे
मुझे समझाया
कि इतना बड़ा
तब सचमुच
मुझे भी लगा
कि जितना जिसके
जीवन में समा जाए
भगवान उतना ही बड़ा।
14
मैं कविता लिखता हूँ
अब जब
मैं कविता लिखता हूँ -
आकाश हँस देता है,
चिड़िया गाने लगती है,
और नदी मुस्कुराकर
आगे बढ़ जाती है।
जैसे सब पूछते हों,
कि हमारे सिवाय
तुम और क्या
लिखते हो?
15
कल?
यहाँ के लोग
वक्त के
बड़े पाबंद हैं,
कल का काम
आज नहीं करते और
कल?
कल तो कभी नहीं आता,
इसलिए
कभी नहीं करते।
16
मौत
मुझे मौत में जीवन के फूल चुनना है।
अभी मुरझाना, टूटकर गिरना और अभी खिल जाना है।
कल यहाँ आया था, कौन कितना रहा इससे क्या?
मुझे आज अभी लौट जाना है।
मेरे जाने के बाद लोग आएँ, अर्थी संभालें, कांधे बदलें,
इससे पहले मुझे खुद संभल जाना है।
मौत आए और जाने कब आए,
अभी तो मुझे संभल-संभलकर रोज-रोज जीना और रोज-रोज मरना है।
17
प्रतिदान
चिड़िया ने
अपनी चोंच में
जितना समाया
उतना पिया
उतना ही लिया,
सागर में जल
खेतों में दाना
बहुत था।
चिड़िया ने
घोंसला बनाया इतना
जिसमें समा जाए
जीवन अपना
संसार बहुत बड़ा था।
चिड़िया ने रोज
एक गीत गाया
ऐसा जो
धरती और आकाश
सब में समाया
चिड़िया ने सदा सिखाया
एक लेना
देना सवाया।
18
मन ही तो है
यह जानते हुए भी
कि किसी को
कुछ दे नहीं पाऊँगा,
दिया भी नहीं जा सकता,
मन करता है
अपने को समूचा दे दूँ।
किसी की पीड़ा
बाँट नहीं सकूँगा,
कोई बाँट भी नहीं सकता,
मन करता है
सबकी पीड़ा
अपने में ले लूँ।
सारा रास्ता
अकेले ही तय करूँगा,
सभी को करना होता है,
मन करता है
कि सबको साथ ले लूँ।
19
ना सही
माना कि हममें
भगवान बनने की
योग्यता है
पर इस बात पर
हम इतना
अकड़ते क्यों हैं?
(वह तो किसी
चींटी में भी है)
सवाल सिर्फ
योग्यता का नहीं
हू-ब-हू होने का है
स्वयं को
भगवान मानने/मनवाने का नहीं
स्वयं भगवान
बन जाने का है
और फिर इस बार
ना सही भगवान
एक बेहतर
इन्सान तो बन जाएँ।
20
एक अहसास था
जहाँ तरलता थी
मैं डूबता चला गया,
जहाँ सरलता थी
मैं झुकता चला गया,
संवेदनाओं ने
मुझे जहाँ से छुआ
मैं वहीं से
पिघलता चला गया।
सोचने को
कोई चाहे
जो सोचे,
पर यह तो एक
अहसास था
जो कभी हुआ
कभी न हुआ।
21
कभी ऐसा हो
कभी ऐसा हो
कि देने का मन हो
और लेने वाला
कोई करीब न हो,
कभी हम
कुछ कहना चाहें
और सुनने वाला
कोई करीब न हो,
तब अहसास होता है
कि देने और
सुनाने वाले से
लेने और सुनने वाला
ज़्यादा कीमती है।
22
सीढ़ी हूँ
मैं तो
लोगों के लिए
एक सीढ़ी हूँ,
जिस पर
पैर रखकर
उन्हें ऊपर पहुँचना है।
तब सीढ़ी का
क्या अधिकार
कि वह सोचे,
कि किसने
धीरे से पैर रखा
और कौन
उसे रौंदता चला गया।
23
चिड़िया
मैं देखता हूँ
चिड़िया
रोज आती है।
और मैं जानता हूँ
वही चिड़िया
रोज नहीं आती।
पर यह दूसरी है
मैं ऐसा कैसे कहूँ!
अच्छा हुआ
मैंने कोई नाम नहीं दिया
उसे चिड़िया ही
रहने दिया।