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मुनिश्री क्षमासागर की कविताओं को बिना पढ़े सोचा जा सकता है कि ये दिगम्बर, वीतराग मुनि की संदेशबहुल नीति-कथाएँ
होंगी, जिनमें सांसारिक जीवन की आसक्तियों/विकृतियों को रेखांकित किया गया होगा, पर ऐसा कतई नहीं है। इनमें वे
अपनी आकांक्षाओं और सपनों के शेष से साक्षात्कार की मुद्रा में उपस्थित हैं। ये ऐसे संवेदनशील कवि की भाषिक संरचनाएं
हैं, जो अनुभव संपन्न और विचारप्रवण तो है ही और वह निर्लिप्त भावुकतावश अपने विचारोद्वेलन की अनुगूँज यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ, कहीं भी और किसी भी बहाने सुन सकता है। इसलिए इन कविताओं में चिड़िया, नदी, समुद्र, सूरज, वृक्ष बार-बार आते हैं, जिनसे बतियाते हुए कवि अपने मन को खोलता और कभी उनके मुख से बोलता मिलता है। ये कवितायेँ सरल हैं, पर सरलता गहरी है। ये कवितायेँ सहज हैं, पर सहजता निर्मम है। ये परोक्ष में सन्देश भी कह जाती हैं, पर अपमान नहीं करतीं । इनमें कवि की सूक्ष्म अंतर्दृष्टि समकालीन जीवन-स्थितियों से निराक्रोश मुठभेड़ करती है।
- डॉ सरोज कुमार, इंदौर


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